बिहार की सांस्कृतिक और हस्तशिल्प विरासत को एक बड़ी पहचान मिली है राज्य के तीन पारंपरिक उत्पाद जिनमें शामिल है नालंदा की 52 बूटी साड़ी ,गया कि पत्थरकट्टी कला और भोजपुर की पीढ़िया पेंटिंग जिसे आई टैग दिया गया है। इससे न सिर्फ बिहार की सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय पहचान मिली बल्कि वैश्विक स्तर पर भी इन उत्पादों को नई पहचान मिलेगी। जी आई टैग मिले इन कलाओं की अलग पहचान है और यह वर्षों से बिहार की सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा रहे हैं। आपको बता दें कि इस उपलब्धि के पीछे नाबार्ड और बिहार सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण रही है दोनों संस्थाओं के संयुक्त प्रयास से इन पारंपरिक उत्पादों का दस्तावेजीकरण और पंजीकरण का कार्य सफलतापूर्वक पूर्ण किया गया। जी आई टैग मिलने के बाद इन उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में विशेष पहचान और कानूनी संरक्षण मिलेगा। नाबार्ड के अनुसार जी आई पंजीकरण की प्रक्रिया को सफल बनाने में वाराणसी के ह्यूमन वेलफेयर एसोसिएशन के महासचिव और पद्मश्री डॉ रजनीकांत का विशेष योगदान रहा है इन्होंने तकनीकी मार्गदर्शन दिया और आवश्यक दस्तावेज तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई इसी वजह से बिहार के इन तीन उत्पादों को जी आई सूची में शामिल किया जा सका।जी आई टैग मिलने से सबसे बड़ा लाभ स्थानीय कारीगरों, बुनकरों और कलाकारों को मिलेगा क्योंकि अब इनके उत्पाद को वैश्विक पहचान मिलेगी इससे उनकी आय बढ़ाने की संभावना है और पारंपरिक कला से जुड़े लोगों को नए अवसर मिलेंगे इससे उनकी आय बढ़ाने की संभावना है और जी आई टैग मिलने से अब इन
उत्पादों के नाम पर नकली सामान बेचा नहीं जाएगा और इनकी प्रमाणिकता सुरक्षित रहेगी इससे असली उत्पादों की मांग बढ़ेगी और कारीगरों को उचित मूल्य मिलेगा। इस पर विशेषज्ञों का कहना है कि इस उपलब्धि से बिहार के पर्यटन और हस्तशिल्प उद्योग को नई गति मिलेगी साथ ही युवाओं का रुझान भी पारंपरिक कला और शिल्प की ओर बढ़ेगा, इससे रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और बिहार की सांस्कृतिक पहचान मजबूत होगी। गौरतलब है कि नालंदा की 52 बूटी बनाई बिहार की प्राचीन वस्त्र कला का अनूठा उदाहरण मानी जाती है इस कला में कपड़ों पर 52 तरह की पारंपरिक बूटियाँ और सांस्कृतिक प्रतीकों की हाथ से बुनाई की जाती है यह परंपरा मुख्य रूप से बसवान बीघा और आसपास के क्षेत्रों में सदियों से अपना अस्तित्व तलाश रहा है वही गया का पत्थर कट्टी स्टोन क्राफ्ट करीब 300 साल पुरानी विरासत माना जाता है आपको बता दें कि यहां के कारीगर और स्थानीय कलाकार ग्रेनाइट पत्थरों से भगवान बुद्ध और अन्य देवी देवताओं से जुड़ी कलाकृतियां तैयार करते हैं। यह शिल्प कला देश भर में अपनी बारीक नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है। इसके अलावा भोजपुरी की पीढ़िया पेंटिंग भी बिहार की लोक संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है यह
यहां के कारीगर और स्थानीय कलाकार ग्रेनाइट पत्थरों से भगवान बुद्ध और अन्य देवी देवताओं से जुड़ी कलाकृतियां तैयार करते हैं। यह शिल्प कला देश भर में अपनी बारीक नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है। इसके अलावा भोजपुरी की पीढ़िया पेंटिंग भी बिहार की लोक संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है यह कला पारंपरिक रूप से महिलाएं त्योहारो और विशेष अवसरों पर बनाते हैं इसमें प्राकृतिक रंगों और पारंपरिक प्रतीकों के माध्यम से ग्रामीण जीवन, पारिवारिक रिश्तों और धार्मिक मान्यताओं को चित्रित किया जाता है।