सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाई कोर्ट के एक आदेश पर नाराज़गी जताते हुए यौन अपराधों के प्रति जजों को संवेदनशील बनाए जाने पर ज़ोर दिया है, दरअसल
9 जुलाई को पटना हाई कोर्ट ने एक मामले में टिप्पणी की कि छाती दबाने और सलवार उतारने का प्रयास बलात्कार की कोशिश के दायरे में नहीं आते।सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस वी मोहना और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच के सामने पटना हाई कोर्ट के फ़ैसले का ज़िक्र हुआ।सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे ही एक मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक फ़ैसले का स्वत: संज्ञान लिया था। आपको बता दें कि इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मार्च 2025 में अपने एक फ़ैसले में कहा था, "पीड़िता के स्तन को छूना और पायजामे की डोरी तोड़ने को बलात्कार या बलात्कार की कोशिश के मामले में नहीं गिना जा सकता है।
बाद में 26 मार्च 2025 को सुप्रीम कोर्ट में इस फ़ैसले पर रोक लगाई.
लाइव लॉ वेबसाइट के मुताबिक, सीजेआई सूर्यकांत ने फ़ैसला सुनाने से पहले पूरा रिसर्च नहीं करने पर अफ़सोस जताया और कहा कि बेंच पटना हाई कोर्ट के फ़ैसले पर एक विस्तृत आदेश पारित करेगी। यह मामला बिहार के बांका ज़िले का है, यहां अभियुक्त हिमांशु कुमार पाठक उर्फ़ मिथिया पाठक की फोटोग्राफ़ी की एक दुकान है।
19 जनवरी 2008 की शाम साढ़े चार बजे एक महिला अपने पिता के साथ स्टूडियो में फोटो खिंचाने आई थी।
हिमांशु कुमार पाठक पर आरोप है कि वो महिला को स्टूडियो के अंदर ले गया और तस्वीर खिंची लेकिन बाद में महिला के
हिमांशु पर आरोप है कि उसने महिला का शरीर छुआ और सलवार खोलने की कोशिश की। इस बीच महिला ने शोर मचाया जिसके बाद महिला के पिता स्टूडियो के दरवाज़े के पास आए और दरवाज़ा खोलने की कोशिश की लेकिन इसके बाद अभियुक्त दरवाज़ा खोलकर भाग गया. इस दौरान वहां और लोग भी जमा हो गए।
इस बीच महिला ने शोर मचाया जिसके बाद महिला के पिता स्टूडियो के दरवाज़े के पास आए और दरवाज़ा खोलने की कोशिश की लेकिन इसके बाद अभियुक्त दरवाज़ा खोलकर भाग गया इस दौरान वहां और लोग भी जमा हो गए।इस मामले में नवंबर 2013 में निचली अदालत ने फ़ैसला सुनाया।
निचली अदालत ने हिमांशु को आईपीसी की धारा 376/511 और 342 के तहत दोषी करार दिया. धारा 376/511 रेप की कोशिश और धारा 342 बंधक बनाने से जुड़ी धाराएं हैं।
निचली अदालत ने अपने फ़ैसले में धारा 376/511 के तहत हिमांशु पाठक को तीन साल का कठोर कारावास और पांच हज़ार रुपये का जुर्माना लगाया था।
वहीं, धारा 342 के तहत दोषी पाए जाने पर निचली अदालत ने 6 माह की सजा सुनाई थी. ये दोनों ही सजाएं एक साथ चलनी थी।
निचली
वहीं, धारा 342 के तहत दोषी पाए जाने पर निचली अदालत ने 6 माह की सजा सुनाई थी. ये दोनों ही सजाएं एक साथ चलनी थी।
निचली अदालत के इस फ़ैसले को हिमांशु पाठक ने पटना हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान हिमांशु के वकीलों अजय मुखर्जी और गणेश शर्मा का तर्क था कि निचली अदालत का फ़ैसला ग़लत और अनुचित है।
साथ ही जब घटना 19 जनवरी को हुई तो एफ़आईआर 20 जनवरी को क्यों कराई गई ? वकीलों का कहना था कि एफ़आईआर में हुई देरी का ठोस कारण नहीं बताया गया।, वहीं असिस्टेंट पब्लिक प्रॉसिक्यूटर अभय कुमार ने कहा कि अपराध के आरोप 'गंभीर प्रकृति' के हैं।इस पर हाई कोर्ट ने कहा है कि इस मामले में महिला, उनके माता-पिता, केस के जांच अधिकारी और एक चश्मदीद गवाह थे हालांकि सुनवाई के दौरान चश्मदीद अपनी गवाही से पलट गया।
अपने 23 पन्ने के फ़ैसले में जस्टिस पूर्णेदु सिंह ने कहा है कि पेनिट्रेशन का सुबूत नहीं है. साथ ही ऐसा कोई स्पष्ट सुबूत नहीं है जिसे बिना किसी संदेह के बलात्कार की कोशिश माना जा सकता है. मेडिकल पुष्टि के अभाव में इस मामले में धारा 376/511 नहीं लगाई जा सकती।
हालांकि, कोर्ट ने माना कि अभियुक्त ने बल प्रयोग करके महिला को स्टूडियो में बंद किया. उसकी सलवार खोलने की कोशिश की और साथ ही उसकी छाती दबाई ।
कोर्ट ने कहा, "अभियुक्त की ये हरकतें साबित करती हैं कि महिला पर आपराधिक बल का इस्तेमाल इस इरादे के साथ या कम से कम इस जानकारी के साथ किया गया था कि ऐसी हरकतों से उसकी मर्यादा को ठेस पहुंच सकती है. ऐसे में ये मामला आईपीसी की धारा 354 की ज़रूरी शर्तों को पूरा करता है।
धारा 354 महिला की लज्जा भंग करने के इरादे से उस पर हमला या आपराधिक बल प्रयोग से संबंधित है।इस मामले में महिला की कोई मेडिकल जांच नहीं हआईकोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आईपीसी की धारा 376/511 के तहत लगे आरोपों को सिद्ध करने में नाकाम साबित हुआ। इस मामले के गवाह और इंवेस्टिगेशन ऑफ़िसर कैलाश प्रसाद ने इस केस का जिम्मा कुछ समय के लिए ही संभाला था। उन्होंने न तो गवाही रिकॉर्ड की थी और न ही फ़ाइनल चार्जशीट जमा की थी।कोर्ट ने इस मामले में माता-पिता की गवाही को 'स्वतंत्र' नहीं माना और इस मामले में हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फ़ैसले को रद्द करते हुए अभियुक्त को सभी आरोपों से बरी कर दिया।बीते कई साल में ऐसे मामले सामने आए जब महिलाओं को लेकर दिए हाई कोर्ट के फ़ैसलों को विवादित माना गया। उच्च न्यायालय के लगातार ऐसे फ़ैसलों से तो महिलाएं न्याय व्यवस्था पर अपना भरोसा खो देंगी ये महिलाओं की मानसिक सेहत के लिए भी ख़तरनाक है किसी रेप विक्टिम के लिए काउंसलिंग का प्रावधान है, लेकिन अगर हमारी न्याय प्रणाली ही इस तरह के आदेश दे तो आखिर महिलाएं क्या करेंगी?"




