1977 में देश में इमरजेंसी के बाद हुए लोक सभा चुनाव में जीत के साथ ही 29 वर्ष की आयु में संसद पहुंचे । इससे पहले इन्होंने नौकरी छोड़ी, इमर्जेंसी के दौरान जे पी आंदोलन से जुड़े। 

 

 

आज की इस खास पेशकश में हम बात कर रहे हैं बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव की। आइये जानते हैं कि कैसे एक गरीब परिवार का लड़का बिहार की सबसे ताक़तवर कुर्सी तक पहुंचा। 

 

अपने मजाकिया लहज़े से गंभीर से गंभीर मुद्दों पर हँसाने वाले पूर्व रेल मंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव का जन्म बिहार के गोपालगंज जिले के फुलवरिया गांव में एक किसान परिवार में 11 जून 1948 को हुआ था। इनकी राजनीतिक यात्रा वर्ष 1974 के जयप्रकाश नारायण के छात्र आंदोलन से शुरू हुई थी। इस आंदोलन की बदौलत ही बिहार को लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार जैसे दिग्गज नेता मिले।

 वर्ष 1977 में आपातकाल के बाद हुए लोकसभा चुनाव में लालू प्रसाद यादव 29 वर्ष की उम्र में लोकसभा सांसद बने तब लालू ना तो दिग्गज नेताओं में शुमार थे और ना ही इनके परिवार का राजनीति से कोई लेना देना था।

 1980 से 1989 तक यह दो बार विधानसभा के सदस्य रहे और विपक्ष के नेता के पद पर भी रहे थे। 1990 में बिहार के मुख्यमंत्री बनने के बाद 1995 में भी भारी बहुमत से यह विजई रहे। 

 

लालू प्रसाद के जनाधार में एम यानी कि मुस्लिम और वाई यानी कि यादव फैक्टर का बड़ा योगदान है और वह इस बात को स्वीकार भी करते हैं। 

 

अपनी बात कहने

का लालू यादव का खास अंदाज है और यही अंदाज इन्हें दूसरे राजनेताओं से अलग बनाता है। संसद में चल रहे सत्र के दौरान इनके द्वारा कही गई बातें सुनकर बड़े से बड़े विपक्ष के नेता भी खुद को मुस्कुराने से नहीं रोक पाते। 

 

लालू प्रसाद यादव ने अपने गांव के स्थानीय विद्यालय से प्रारंभिक शिक्षा की पढ़ाई पूरी की और उच्च शिक्षा के लिए पटना आ गए और पटना विश्वविद्यालय से स्नातक और विधि की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद 1 जून 1973 को इनका विवाह श्रीमती रावड़ी देवी से हुआ इनके कुल 9 बच्चे हैं जिम साथ बेटियों और दो बेटे हैं। 

 

आपको बता दें कि वर्ष 1970 में यह पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष भी बने थे और महज 29 वर्ष की आयु में यह जनता पार्टी के टिकट पर नवीन लोकसभा के लिए चुने जाने पर उसे वक्त लोकसभा के सबसे युवा सदस्यों में से एक थे।

 

 इसके बाद 1980 में इन्होंने बिहार राज्य विधानसभा चुनाव लड़ा और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उम्मीदवार को हराकर जीत हासिल की। वर्ष 1985 में यह इस सीट से दोबारा चुने गए।

 

 लालू प्रसाद यादव ने स्वयं को निचली जातियों और अल्पसंख्यकों के नेता के रूप में स्थापित किया था जिसकी वजह से

बाद 1980 में इन्होंने बिहार राज्य विधानसभा चुनाव लड़ा और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उम्मीदवार को हराकर जीत हासिल की। वर्ष 1985 में यह इस सीट से दोबारा चुने गए।

 

 लालू प्रसाद यादव ने स्वयं को निचली जातियों और अल्पसंख्यकों के नेता के रूप में स्थापित किया था जिसकी वजह से यह पिछड़ी हिंदू जातियों और मुस्लिम अल्पसंख्यकों के समर्थन से बिहार के एक लोकप्रिय नेता बन गए।

 

 इसके अलावा लालू प्रसाद दो बार बिहार के मुख्यमंत्री रहे पहली बार 10 मार्च 1990 से 3 अप्रैल 1995 तक 5 साल के कार्यकाल के लिए और दूसरी बार 4 अप्रैल 1995 से 25 जुलाई 1997 तक 3 साल के कार्यकाल के लिए यह बिहार के मुख्यमंत्री चुने गए। 

 

वर्ष 1996 में चारा घोटाला विवाद को लेकर जनता दल में नेतृत्व का विद्रोह शुरू हुआ इसी कारण इन्हें जुलाई 1997 में पर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा और इनकी जगह उनकी धर्मपत्नी श्रीमती रावड़ी देवी ने मुख्यमंत्री का पद संभाला।

 

 इस घटना के बाद लालू प्रसाद यादव ने जनता दल से संबंध तोड़कर अपनी एक अलग पार्टी बनाई और उसे नाम दिया राष्ट्रीय जनता दल यानी आरजेडी और उसके यह अध्यक्ष बने ।

 

वर्ष 1998 में यह लोकसभा के लिए पुनः निर्वाचित हुए और 2002 में लालू प्रसाद यादव राज्यसभा के लिए चुने गए इसके साथ ही वर्ष 2004 तक इस पद पर यह आसीन रहे। इसी दौरान उनकी पत्नी रावड़ी देवी आरजेडी से बिहार की मुख्यमंत्री बनी और 2005 तक वह इस पद पर बनी रहीं।

 

 जब लालू यादव रेल मंत्री नियुक्त हुए तब भारतीय रेल घाटे में चल रही थी। रेल मंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान इन्होंने रेलवे के लिए राजस्व के अन्य स्रोत तलाशे और यात्री किराया में कोई बदलाव नहीं किया। इन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन करने के लिए रेलवे स्टेशनों पर चाय बेचने के लिए प्लास्टिक कपों के स्थान पर मिट्टी के बने कुल्हड़ का प्रयोग शुरू किया।

 

 उस वक्त इनकी रणनीतियों के कारण रेलवे कोजल्द ही करोड़ों का मुनाफा हुआ और उनकी यह रणनीति दुनिया भर की बिजनेस स्कूलों को आकर्षित किया जो कंपनी पर किए गए उनके प्रयोगों को बिजनेस स्नातकों के लिए एक केस स्टडी में बदलना चाहते थे।

 

वर्ष 2005 में बिहार विधानसभा चुनाव दोबारा हुए और राजद को जेडीयू और भाजपा गठबंधन से कम सीटें मिलीं ।उस वक्त इन्हें केवल 54 सीटें ही मिल पाई थी और परिणाम स्वरूप नीतीश कुमार बिहार की सत्ता में आ गए।

 

 2009 के चुनाव में राजद को उन 44 सीटों में से केवल चार सीटें ही मिली जिन पर उसने चुनाव लड़ा था। इसके बाद 2010 में बिहार विधानसभा चुनाव में आर जे डी केवल 22 सीटें ही जीत सकी।

 

 लालू प्रसाद यादव ने अपनी पार्टी को पुनः सत्ता में लाने के लिए काफी कोशिश की लेकिन चारा घोटाले मामले में पर आरोप सिद्ध हो जाने के बाद पार्टी के लिए यह एक बड़ा झटका साबित हुई।

 

 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में राजद ने शानदार वापसी की। आर जे डी और जदयू के पास राज्य में सरकार बनाने के लिए पूर्ण बहुमत था लेकिन यह गठबंधन ज्यादा समय तक नहीं टिक पाया नीतीश कुमार ने गठबंधन तोड़कर भाजपा के साथ हाथ मिला लिया था। 

 

इसके बाद लालू प्रसाद यादव को 1996 के पहले हुए चारा घोटाले मामले में दोषी ठहराया गया और इस घोटाले में बिहार में पशुओं के चारे की खरीद के लिए आवंटित 95 अरब रुपए की चोरी भी शामिल थी।

 

 इन पर बांका जिले और भागलपुर जिले के कोषागारों से धोखाधड़ी करके 47 लाख रुपए निकालने का आरोप भी लगाया गया था इन्हें 2017 में दूसरे चारा घोटाले में दोषी ठहराया गया था इस घोटाले में 1991 से 1994 के बीच देवघर कोषागार से लगभग 89 लाख रुपए की धोखाधड़ी से निकासी शामिल थी ,जब लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री थे और वित्त विभाग के प्रभारी थे तब इनके कार्यकाल के दौरान यह घोटाले हुए थे। सजा के दौरान दिन पर 10 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया गया था।

 

वर्ष 2018 का तीसरा चारा घोटाला मामला झारखंड के चाईबासा कोषागार से लगभग 37.62करोड रुपए की धनराशि की निकासी से संबंधित है लालू प्रसाद यादव और जगन्नाथ मिश्र को इसके लिए 5 साल की कैद की सजा सुनाई गई और इन पर न्यायालय 10 लाख रुपए का जुर्माना लगाया गया। 

 

इन्हें दुमका जिले के कोषागार से 3.13 करोड रुपए निकालने के आरोप में 1996 के चौथे चारा घोटाले मामले में सीबीआई की विशेष अदालत द्वारा दोषी धराया गया था इन्हें आई आर टीसी और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियमों के तहत सात- सात साल की जेल की सजा सुनाई गई है ।

और हाल ही में 2022 के पांचवें चारा घोटाले मामले में विशेष सीबीआई अदालत द्वारा डोरंडा कोषागार से भी बड़ी रकम की अवैध निकासी के लिए इन्हें दोषी माना गया है और इसके लिए इन्हें 5 साल के कारावास और 60 लाख रुपए के जुर्माने की सजा सुनाई गई है। 

 

आपको बता दें कि लालू प्रसाद यादव द्वारा कुछ किताबें भी लिखी गई है जिनमें से एक है" लालू प्रसाद भारत का चमत्कार" और उनकी दूसरी किताब है" लालू प्रसाद यादव एक करिश्माई नेता "उनकी तीसरी किताब का नाम है" बिहार और लालू यादव का निर्माण" और उनकी चौथी किताब है "गोपालगंज से रायसीना रोड "जो उनकी आत्मकथा भी मानी जाती है। लालू प्रसाद यादव के ऊपर बॉलीवुड में फिल्म भी बनी है फिल्म का नाम है -पद्मश्री लालू प्रसाद यादव ।

 

लालू प्रसाद यादव भारतीय राजनीति के ऐसे नाम हैं जिन्हें नजरंदाज करना नामुमकिन सा है। भले ही इनका नाता विवादों सेरहा हो लेकिन बिहार के मुख्यमंत्री के पद पर रहते हुए इन्होंने सोशल जस्टिस और मंडल कमीशन के नाम पर जो सियासत का रुख इन्होंने ने बदला है उससे पूरे देश की राजनीति की दिशा ही बदल गई ।

 

आर जे डी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव आज यानी 11 जून को अपना 78वाँ जन्मदिन मना रहे हैं। बात चाहे सत्ता की हो या विपक्ष की दशकों तक लालू प्रसाद यादव राजनीति की धुरी रहे हैं।