कश्मीर में आतंकवाद के शुरुआती दौर में घटी सबसे बड़ी अमानवीय घटना में शामिल कश्मीरी हिंदू नर्स सरला भट्ट के अपहरण और हत्या मामले में 35 साल बाद निर्णायक मोड़ आया है। दरअसल जम्मू कश्मीर की प्रदेश जांच एजेंसी ने 737 पृष्ठों का आरोप पत्र दाखिल कर जेकेएलएफ के तत्कालीन प्रमुख कमांडर मोहम्मद यासीन मलिक समेत 5 आतंकियों की भूमिका को स्वीकार किया है। एजेंसी का दावा है कि नर्स सरल भट्ट की हत्या कश्मीरी पंडितों में दहशत फैलाने और उन्हें घाटी छोड़ने से मजबूर करने की सुनियोजित आतंकी साजिश का हिस्सा थी। जांच एजेंसी के अनुसार जांच में मोहम्मद यासीन मलिक , खुर्शीद अहमद चालुक, अब्दुल हामिद शेख और अन्य आरोपी शामिल थे। इस घटना में शामिल कुछ आरोपी पहले ही मारे जा चुके हैं जबकि यासीन मलिक तिहाड़ जेल में बंद है। आपको बता दें कि यासीन मलिक को terror funding or आतंकी गतिविधियों से जुड़े मामलों पर पहले ही आजीवन कारावास की सजा सुना दी गई है। इसके अलावा रुबैया सईद अपहरण कांड और 1990 में भारतीय वायु सेना के चार कर्मियों की हत्या से जुड़े मामलों पर भी मुकदमा दर्ज किया गया है एस आई ए ने फरार आतंकी खुर्शीद अहमद के विरूद्ध प्रोक्लेमेशन की कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी है। एजेंसी के अनुसार आतंकी खुर्शीद के पाक अधिकृत कश्मीर भाग जाने के प्रयास लगाए जा रहे हैं। सौरा में स्टाफ नर्स के रूप में कार्यरत सरल भट्ट का अपहरण 18 अप्रैल 1990को कर लिया गया था। उन्हें अमानवीय यातनाएं और शारीरिक प्रताड़ना देने के बाद

गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गई थी। घटना के अगले ही दिन गोलियों से छलनी उनका शरीर बरामद किया गया। यह घटना कश्मीर में आतंकवाद की सबसे वीभत्स घटनाओं में से एक मानी जाती है। उस वक्त आतंकियों के डर से कोई भी गवाह सामने नहीं आया और यह मामला दशकों तक अनसुलझा रहा। 18 मार्च 2024 को पुलिस महानिदेशक के निर्देश पर इस मामले की जांच प्रदेश जांच एजेंसी को सौंपी गई। एजेंसी नहीं गवाहों के बयान , आई विटनेस, forensic, मेडिकल साक्ष्य, दस्तावेजी रिकॉर्ड, और फील्ड जांच के आधार पर घटनाक्रम का पुनर्निर्माण किया और 737 पेज का आरोप पत्र दाखिल किया। जांच एजेंसी द्वारा यह भी कहा गया है की सरला भट्ट को मुखबिर बताने का आरो पूरी तरह से झूठा और मनगढ़ंत था। यह केवल उसे हत्या को उचित ठहराने के लिए आतंकियों द्वारा बनाया गया सुनिययोजित प्लान का हिस्सा था। यह भी दावा किया गया है कि इस हत्या का उद्देश्य केवल कश्मीरी पंडितों के अंदर दहशत फैलाना और अलगाववादी एजेंडे को आगे बढ़ना था। आरोप पत्र में भारतीय दंड संहिता की धाराओं 364, 341,302, 201 और धारा 120- बी, टाडा अधिनियम और इंडियन आर्म्स एक्ट कि संबंधित धाराओं के तहत अपराध घोषित किए
गया है कि इस हत्या का उद्देश्य केवल कश्मीरी पंडितों के अंदर दहशत फैलाना और अलगाववादी एजेंडे को आगे बढ़ना था। आरोप पत्र में भारतीय दंड संहिता की धाराओं 364, 341,302, 201 और धारा 120- बी, टाडा अधिनियम और इंडियन आर्म्स एक्ट कि संबंधित धाराओं के तहत अपराध घोषित किए गए। एस आई ए ने साफतौर पर कहा है कि 35 वर्ष बाद आरोप पत्र दाखिल होना यह दर्शाता है कि आतंकवाद के मामलों में समय कभी भी आतंकियों का ढाल नहीं बन सकता। चाहे कितना भी वक्त बीत जाए आतंकवादियों को सजा जरूर मिलती है। एजेंसी ने इसे आतंकवाद के पीड़ितों, विशेष कर कश्मीरी पंडित समुदाय के लिए न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया है। 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने 1990 के दशक में कश्मीरी पंडितों की हत्याओं की दोबारा जांच करने वाली याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी थी की घटना के लगभग 27 साल बाद साक्ष्य जुटाना मुश्किल होगा। इसके बाद 2023 में उप राज्यपाल मनोज सिन्हा के निर्देश पर 1990 के दशक के लंबित मामलों की समीक्षा शुरू हुई इसी क्रम में सरला भट्ट हत्याकांड सहित कई लंबित मामले की जांच दोबारा शुरू हुई। हालांकि यह मामला सैकड़ो लंबित मामलों में से केवल एक है फिर भी चार्ज शीट दाखिल होना कश्मीरी हिंदू समुदाय के लिए एक उपलब्धि मानी जा रही है।l