गर्मियां शुरू होते हैं भारत के अधिकतर शहर पानी की कमी की समस्या से जुझते हैं। इस जन्म दौरान टैंकरों की कतारे लग जाती हैं हर उन शहरों में रहने वाले लोग जितना हो सके उतना पानी जमा करते हैं पानी की कमी के संकट के पीछे कई कहानियां है और कई कारण शामिल है। हमारे कई शहर अपने पानी के खर्चे के खुद पर निर्भर नहीं है। ऐसे में गर्मियां आते ही देश की कई शहरों में पानी की मांग बढ़ जाती है। इससे बीच आए एक जानकारी ने लोगों को हैरान कर दिया है राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली समेत भारत के कई बड़े शहर इस समस्या से निपटाने की कोशिश कर रहे हैं। समस्या इस कदर हावी हो गई है कि पिछले वर्ष तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में जीरो डे जैसी स्थिति आ गई थी। शहरों की बढ़ती आबादी के कारण पानी की सप्लाई और डिमांड में भारी अंतर देखने को मिलता है।विभिन्न रिपोर्ट के अनुसार देश के करीब 80% आबादी साल के किसी ना किसी हिस्से में जल समस्या से जूझती रहती है। वर्तमान में भूजल का जरूरत से ज्यादा होने के कारण, जलाशयों की घटती संख्या और हर दिन बढ़ती आबादी के कारण पानी की किल्लत देखने को मिल रही है। इनमें राजस्थान, का नाम सबसे पहले आता है क्योंकि राजस्थान की 29 जिले सबसे ज्यादा भूजल दोहन में आगे हैं। इसके अलावा उत्तर प्रदेश के 38 जिले ऐसे हैं जहां पानी की कमी एक विकट समस्या का रूप ले चुकी है। पंजाब और हरियाणा जैसे कृषि

प्रधान राज्यों में भू जल स्तर तेजी से घट रहा है। दक्षिण भारत में तमिलनाडु की स्थिति बेहद ही जनता जनक है आपको बताने की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली विश्व में सबसे अधिक जल संकटग्रस्त शहरों में शामिल है। फैलाने की बात यह है कि बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों में भी पानी की कमी की समस्या देखने के लिए मिल रही है। गौरतलब है कि दक्षिणी और पश्चिमी भारत में सबसे अधिक सूखे का प्रकोप देखने के लिए मिलता है। इन सभी क्षेत्रों में जलाशयों पर लगातार दबाव बढ़ रहा है। इसके साथ हैं पूर्वोत्तर भारत के कुछ राज्य जैसे मिजोरम और मेघालय में भारी बारिश होने के बाद भी पानी की कमी की समस्या से हर दिन जूझ रहे हैं इसका कारण है बुनियादी ढांचे और जल प्रबंधन का सही तरीका ना अपनाना। आज के समय में पानी की समस्या से निपटने के लिए डीसेलिनेशन तकनीक का इस्तेमाल कई देशों द्वारा किया जा रहा है इस तकनीक में समुद्र के खारे पानी को नमक और अन्य अशुद्धियां हटाकर पीने योग्य और खेती के लिए सिंचाई योग्य बनाया जा रहा है। सामान्यत इस प्रक्रिया के लिए रिवर्स ऑस्मोसिस तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि डीसैलीनेशन जैसी प्रक्रिया देखने और सुनने
द्वारा किया जा रहा है इस तकनीक में समुद्र के खारे पानी को नमक और अन्य अशुद्धियां हटाकर पीने योग्य और खेती के लिए सिंचाई योग्य बनाया जा रहा है। सामान्यत इस प्रक्रिया के लिए रिवर्स ऑस्मोसिस तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि डीसैलीनेशन जैसी प्रक्रिया देखने और सुनने में काफी सरल लगती है लेकिन इसका संयंत्र स्थापित करना काफी महंगा और खर्चीला होता है इसके अलावा इसमें बिजली की खपत भी ज्यादा होती है। कुछ जानकार बताते हैं कि अब कुछ ऐसी तकनीक इजाद की गई है जिसके कारण आने वाले समय में लागत कम हो सकती है और जनसंख्या के बड़े भाग को पीने योग्य पानी सरलता से मिल सकता है।